शनिवार, 5 दिसंबर 2020

हजरत नाहर शाह वली की कहानी , जावेद शाह की जुबानी

#नाहरशाह_वली_की_कहानी 
लेखक:-जावेद शाह खजराना
       Hajrat Nahar Shah wali Gumbad

इंदौर शहर की पहचान आन-बान और शान यहां के सर्वधर्म सदभाव और आपसी भाईचारा से है। जो अपने अंदर मोहब्बत भरा इतिहास समेटे हुए है । इंदौर शहर क़रीब 300 साल पुराना है।
होल्कर स्टेट से पहले जब यहां रावला जमींदारों का राज था। तब भी हिन्दू-मुस्लिम जूनीइंदौर में साथ-साथ रहते थे। कलालकुई, कटकट पूरा, आलापुरा , दौलतगंज और रानीपुरा इसके उदाहरण है।
जूनीइंदौर से दूर पूरब दिशा में स्थित खजराना में सय्यद नाहरशाह वली की दरगाह जहां बरसों से इंसानियत के अलमदार पीर-फकीरों का आवागमन रहा है इंदौर से पहले से आबाद थी । 
परमारकालीन खजराना राजा भोज के समय से 1000 साल से वजूद में है।
दिल्ली के हजरत निज़ामुद्दीन औलिया और अजमेर के ख्वाज़ा गरीब नवाज के दरबार आम में देशी-विदेशी और सभी मजहब के नर-नारी , नेता- अभिनेता बिना भेदभाव से हिस्सा लेते है और अपनी मुरादों की चादर चढ़ाते हैं।
ठीक उसी प्रकार खजराना की प्राचीन नाहरशाह वली की मुकद्दस दरगाह भी सभी मजहब के मर्द-औरतों के अलावा किन्नरों की भी इबादत का मरकज है जहां बरसों से जायरीन आ रहे हैं।
          Hajrat Nahar Shah Wali Dargah

इंदौर दिग्दर्शन क़िताब में लिखा है कि जूना रिसाला निवासी होल्कर सूबेदार अब्दुल मजीद से जब इंदौर के स्वतंत्रता सेनानी और इतिहासकार नगेन्द्र आज़ाद ने नाहरशाह वली के बारे में पूछा
 तब उन्होने बताया कि बुजुर्गों के बुजुर्ग बताते थे कि "खजराना इलाके में एक अल्लाह के वली की लाश पड़ी थी । फ़क़ीर ने कहा दिया था कि मौत के बाद मेरी लाश तब ही दफ़नाई जाए पहले 'तहज्जुद' की नमाज अदा हो जाए ।"
तहज्जुद की नमाज वो ही व्यक्ति पढा सकता हैं जिसने होश संभालते ही ज़िंदगी में कभी भी कोई भी नमाज क़ज़ा ना की हो।
 इस वजह से करीब 3 महीने तक आपका जिस्म मुबारक़ बिना खराब हुए खजराना में पेड़ों के साये में रखा रहा । 
सुभान अल्लाह ।
खजराना के आसपास का इलाका सरहदी रास्ता था यहां मुगलों के पड़ाव होते रहते थे इत्तिफ़ाक़ से मुगल बादशाह औरंगजेब को जब इसकी जानकारी मिली कि अल्लाह के किसी वली की लाश मुबारक़ बिना दफन के रखी है तब नाहरशाह वली के साथियों ने आपको खजराना बुलवाया।
 बादशाह ने कहा- " मैं तहज्जुद की नमाज अदा करवाऊँगा।"
इसके बाद आपकी लाश मुबारक़ को दफनाया और बाद में मजार की तामीर हुई।

नाहरशाह वली की दरगाह पर हाजरी देने वालों में महाराजा तुकाजीराव अपनी रानी और परिवार के साथ यहां यदा-कदा आते रहते थे । क्योंकि ये इलाका आज से 60 साल पहले जंगल से घिरा था। 
देवास की महारानी पुष्पबाला राजे , जंजीरा नवाब की बेगम राबिया सुल्ताना भी यहां की जायरीनों में इस कदर शामिल रही कि मरने के बाद भी आपके आस्ताने के बाहर दफन होना पसंद फरमाया,आज भी जंजीरा परिवार की ख़्वातीनों की मजारें दरगाह के सामने ओटले पर बनी हुई हैं।

कश्मीर के मुख्यमंत्री गुलाम मोहम्मद बक्शी के भतीजे शफी और बेगम नसीम बानो बक्षी भी सन 1972-73 की खजराना उर्स कमेटी के सचिव रहे थे।
फ़िल्म स्टार दिलीप कुमार की फ़िल्म आन की शूटिंग 1950 में खजराना में हुई उस समय फ़िल्म के निर्देशक मेहबूब साहब और दिलीप कुमार दरगाह पर आना नही भूले । इसी फिल्म के अन्य कलाकार निम्मी ,नादिरा और मुकरी भी खजराना आ चुके है। मशहूर पार्श्वगायक मोहम्मद रफ़ीक के दोनों साहबजादे खालिद राशिद और हामिद की शादी 1973 में इंदौर में मिर्जा अब्दुल हमीद साहब की दोनों बेटियों यास्मीन और फौजिया से हुई तब इस शादी में जानी वाकर ,सलमान खान के वालिद सलीम खान ,हेलन ,अजित साहब ,रज़ा मुराद भी शामिल हुए थे ।

1975 में खजराना उर्स के दौरान मोहम्मद रफ़ी साहब नात पढ़ने के लिए बकायदा तशरीफ़ भी लाए थे।
 मरहूम हैदर पहलवान कडाबिन वालों की रिश्तेदारी भी दिलीप कुमार से रही है। ये सब नाहरशाह वली के दरबार में हाजरी दे चुके है।

 मध्यप्रदेश के ज्यादातर कांग्रेसी और भाजपाई नेता गाहे-बगाहे हाजिरी दे चुके है। 
खजराना उर्स का आइडिया ही इंदौर के जग प्रसिद्ध क़व्वाल जख्मी साहब ने दिया और पहला कलाम पढ़कर खजराना क़व्वाली परंपरा की नींव डाली । 
खजराना उर्स में देश के मशहूर कव्वालों में शंकर शम्भू, जानी बाबू, छोटा यूसुफ ,आज़ाद क़व्वाल,मजीद शोला, असलम साबरी, यूसुफ आज़ाद, अंजुम बानो, सीमा राज़, निखत नाज ,कैसर बानो ,  परवीन रंगीली, हमसर हयात, अनीस रईस साबरी, जुनैद सुल्तानी, अज़ीम नाज़ा के अलावा स्थानीय क़व्वाल खालिद साबरी और आफताब कादरी भी अपने जलवे बिखेर चुके हैं।
अब तो हर उर्स के समय तीन दिनी क़व्वाली के अलावा शुरुआती 2 दिन मजहबी तकरीर और मुशायरे के नाम रहते है , जिसे देखने इंदौर ही नही देवास ,महू, धार, उज्जैन , बड़नगर तक से लोग आते हैं।

दरगाह की कमेटी और उर्स की किस्मत फ़िल्म स्टार सलमान खान के चाचा हलीम खान की रिसिवरी में खूब चमकी ।
 जब मैं छोटा था तब दरगाह के खादिम और वारिस मेरे मामू मुख्तयार शाह जी से बहुत सी जानकारी लेता रहता था।  उस वक्त करीब सन 1992 के आसपास सलमान खान के चाचा हलीम खान दरगाह पर हर जुमेरात को दरगाह पर ज़ियारत करने आते थे ।
हलीम साहब लाठी के सहारे दरगाह की सीढ़ियां चढ़कर  गेट के पास बने ओटले पर बैठ जाते।
 मैं उन्हें देखकर रोमांचित हो जाता । मुख्तयार मामू ने उनसे मेरा परिचय करवाया। 
                 Muzawar'S Mazar
मैने हलीम साहब से बहुत- सी जानकारियाँ ली ।
उन्होंने बताया कि दरगाह के लिए चंदा लेने वो मुस्लिम फ़िल्म कलाकरों के पास भी जाते थे और वो फ़िल्म स्टार दिल खोलकर चंदा देते । मैंने कुछ फ़नकारों के नाम पूछे तब उन्होंने वहीदा रहमान का नाम खासतौर पर लिया।उन्होंने ही एक बार उर्स में मोहम्मद रफ़ीक को गवाने के लिए खजराना बुलवा लिया था।
मेरी मम्मी बताती है कि हलीम साहब ने मेरी नानी से मेरी वालदा को गोद माँगा था। चूंकि मेरी वालदा एकमात्र बेटी थी , इसलिए नाना ने इंकार कर दिया था। 
मेरी नानी दरगाह के मुजावरों की बहन-बेटी थी । 
वो अक्सर बताया करती कि -  नाहरशाह वली की दरगाह पर पुराने जमाने में नाहर यानी शेर का डेरा रहता था। शेर-चीतों के बीच में नाहरशाह वली अल्लाह की इबादत किया करते । शेर यानी नाहर बाबा की इबादत करने की जगह को अपनी पूंछ से साफ करता ताकि अल्लाह के वली को पत्थर से कोई तकलीफ ना हो। सफाई करने के बाद शेर बाबा के करीब बैठ जाता । 

किदवंती है कि हज़रत नाहरशाह वली सभी प्राणियों से प्यार करते थे । खुदा के ख़ौफ़ के अलावा उन्हें किसी का ख़ौफ़ नही था । नाहरों के बीच भी वे बे-ख़ौफ़ रहते।


 एक बार मैंने मेरी नानी कुबरा शाह से पूछा-
अल्लाह के इन वली का नाहर शाह नाम कैसे पड़ा? 
उन्होंने जानकारी देते हुए बताया कि खजराने में दरगाह के आसपास खेतीबाड़ी ज्यादातर नायता और पाटीदार समाज के लोग ही करते थे। 
नायता पटेलों की महिलाएं अपने खेतिहर पतियों के लिए घर से खाना लेकर अक्सर पास के खेतों पर जाती। लौटते वक्त जानवरों के लिए घास काटने में शाम हो जाया करती।
 गुज़रते समय रास्ते में बाबा के साथ शेर दिख जाता। अपनी जान मुसीबत में फंसी देखकर घास का गठ्ठर फैंक कर भाग जाती ।
गांव में जाकर लोगों को बताती कि जंगल में एक फ़क़ीर बाबा नाहर के साथ बैठ्या है । बाबा का नाम तो उन्हें मालूम नही था । इसलिए वो ओरतें उन्हें नाहर वाला बाबा पुकारती।
इस तरह अल्लाह के इन वली का नाम नाहरशाह पड़ गया। 

कुछ बुजुर्ग बताते है कि कुछ सालों पहले तक यहां नाहर (शेर) का आना-जाना जारी था। चहल-पहल बढ़ने के कारण धीरे-धीरे ये सिलसिला बंद गया। 
अल्लाह के वली अपने चाहने वालों को अपनी और नाहर की ज़ियारत कराते रहते है।
 ऐसा मुझे कुछ खास मुजावरों ने बताया।
   Main Gate Of Nahar Shah Wali Dargah
नाहरशाह वली के खास करिश्मों में सबसे पहला करिश्मा यहां बे-औलादों को औलाद और कुंवारों द्वारा मन्नत माँगने पर जल्दी शादी हो जाती है । वैसे बच्चों के पैदा होने की मन्नत पूरी होने पर उन्हें फल-लड्डुओं से तोलना आम बात है।
 
मैंने दरगाह के सहन में पालतू कबूतरों का जमावड़ा मुख्तयार मामू के जमाने से लेकर कुछ साल पहले तक देखा । लेकिन कुछ बरसों पहले दरगाह कमेटी ने गंदगी का हवाला देकर उन कबूतरों के मुंह से भी दाना छीन लिया। अब दरगाह में पुरानी मस्जिद , पुराना वजूखाना , पुराना गेट कुछ भी नजर नही आता ।
सब कुछ बदल गया है।
नही बदला तो सिर्फ और सिर्फ़ नाहरशाह वली का करम।

                 लेखक:- जावेद शाह खजराना
                   9340949476 मोबाईल

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