गुरुवार, 17 दिसंबर 2020

jaaved shah khajrana

जावेद शाह खजराना

जावेद शाह खजराना एक प्रसिद्ध पत्रकार, लेखक, कवि और फोटोग्राफर हैं। 26 रमजान हिजरी वर्ष 1398 के अनुसार 30 अगस्त 1978 बुधवार को जूनीइंदोर में जन्में जावेद शाह "एम0 मुस्लिम ऑल इंडिया शाह समाज" में इंदौर सम्भाग अध्यक्ष के पद पर कार्यरत है ।


[[उपलब्धि]]
 जावेद शाह खादिम-ए-ख़ास हज़रत नसीरुद्दीन शाह चिश्ती रह0 के वंशज हैं।  इस्लामी सूफी हजरत अब्दुल्ला शाह बियाबानी रह0 के खादिम नसीरुद्दीन चिश्ती की वंशावली के मुताबिक़ (संदर्भ: - 'शेख अब्दुल्ला शाह दाता बियाबानी' पुस्तक पृष्ठ संख्या 138) 25वी पुश्त से उनकी औलाद है। 
जावेद शाह मानपुर में स्थित हज़रत गेब शाह वली के भी वंशज हैं।
     मानपुर स्थित गेब शाह वली की मज़ार
राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता जावेद की रचनाएँ दैनिक भास्कर, नईदुनीया, प्रभातकिरण, अग्निबाण जैसे स्थानीय समाचार पत्रों में प्रकाशित होती रहती हैं।


[[ शाह समाज से सम्बंध ]]

[खजराना] स्थित हजरत नाहर शाह वली की दरगाह पर मुगल सम्राट [ शाह आलम ] द्वारा नियुक्त शाही मुजावरों इनके पूर्वज थे, वर्तमान में इंदौर संभाग में "शाह समाज के अध्यक्ष" और[ इंदौर] कांग्रेस कमेटी में शहर सचिव हैं। 

[[ बियाबानी स्थित दरग़ाह हजरत नसीरुद्दीन शाह चिश्ती रह0 की वंशावली  ]]

     मेरेे परनाना हजरत नसीरुदीीन की वंशावली

 वंंशावली में 20वी पीढ़ी पर अहमद शाह नाम लिखा है। एहमद शाह के पोते सिकंदर शाह 22वे मुजावर और दरगाह के मैनेजर थे। इन्हीं सिकंदर शाह धार वाले की बेटी फ़ातेमा मेरी दादी है।

सबसे आखरी में नूर अली शाह नाम लिखा है । नूर अली की बहन मेहरून्निसा शाह मेरे दादाजी कुर्बान अली मानपुर वालों की दूसरी पत्नी है। 


सैयद नाहर शाह वली रह0 की दरगाह -खजराना

दोस्तों मालवा प्रदेश से अल्लाह के वलीयो का रिश्ता सदियों पुराना रहा है। कौन-से वली अल्लाह सबसे पहले आए ये तो सिर्फ खुदा ही जान सकता है। 
फिलहाल मैने जो किताबें पढ़ी और दस्तावेज ख़ंगाले।
इससे जो पता चलता है ख़िदमत में हाजिर है।
  किताबों में जो दर्ज है उसके मुताबिक़ धार शहर में सबसे पहले 40 पीर तशरीफ़ लाए। उनकी शहादत के बाद राजा भोज के जमाने में सन 1010 ईसवी के आसपास शाह चंगाल रह0 आए।
  
हजरत मदार शाह रह0 के हिंदुस्तान भर में करीब 1432 चिल्ले हैं , चिल्ला उस जगह को कहते है जहाँ 40 दिन की इबादत की जाती है। इंदौर के कड़ावघाट पर हजरत मदार शाह रह0 का चिल्ला है। इसका भी इतिहास ल हवा है। हजरत एमडीआर

बुधवार, 16 दिसंबर 2020

Khwaja Gareeb Nawaz Old pictures

Old photo Of 
Khwaja Gareeb Nawaz Dargah ajmer
     Very Old real photograph Of khwaja              Gareeb Nawaz Dargah sharif ajmer                  1873
              shahjahani Gate AJMER
YE US TIME Ka photo he jab Sabse Pahle bna hua Nizami gate nhi bana tha.

              Nizami gate AJMER
               Dargaha Bazar 1913

       Mehmmodi Gate| Buland Darwaja
 ajmer First Darwaja Build By Mehmood shah khilaji Mandu .
                    Begham Dalaan 
       khwaja Gareeb nawaj entry gate
           javed shah khajrana ajmer

Khwaja Moinduddin chishti Dargah Ajmer Old photo

Khwaja Gareeb Nawaz Dargah ajmer
Old pic ___ javed Shah khajrana           javed shah khajrana 1991            javed shah khajrana 1992
            javed shah khajrana 2018
            javed shah khajrana 2019

Birthplace Of Film Actor Salman Khan

Film Actor Salman khan Born in indore 27 Desember 1965.
The bed in which Salman Khan was born in the government hospital Kalyanmal Nursing Home, Old Palasia, Indore, is also safe.
              birth place Of salman khan
       Newborn Salman Khan lived for many         days on this bed. 👍
photo And News javed shah khajrana

मंगलवार, 15 दिसंबर 2020

'गुलज़ारे अबरार' के लेखक मोहम्मद गौसी शत्तारी मांडवी

'गुलज़ारे अबरार' के लेखक मोहम्मद गौसी शत्तारी मांडववाले
✍ जावेद शाह खजराना

दोस्तों आपने
 अमीर खुसरो , फरिश्ता और अबुल फ़ज़ल जैसे दरबारी लेखकों के बारे मेें जरूर पढ़ा होगा। इन्हीं महान लेखकों फरिश्ता और अबुल फजल के दौर में ऐसी भी हस्ती गुजरी है जिन्हें बहुत कम लोग जानते हैं। ऐसे ही एक गुमनाम लेकिन अपने वक़्त के मशहूर मुसन्निफ़ (लेखक) का नाम है  हजरत मोहम्मद गौसी शत्तारी मांडवी रह0    ।
मोहम्मद गौसी शत्तारी मांडवी रह0 ने अपनी सारी जिंदगी अल्लाह के वलीयो की सोहबत में रहकर और उनके बारे में लिखते हुए गुजार दी।

 हिंदुस्तान / पाकिस्तान के करीब 612 वलियों की बेशकीमती मालूमात हमें मोहम्मद गौसी शत्तारी मांडवी रह0 द्वारा लिखे गए "गुलज़ार-ऐ-अबरार" ग्रँथ द्वारा ही मिलती है।
सल्तनत दौर में मांडव के पास नालछा गाँव में रंग-बिरंगी छपाई की प्रिंटिंग प्रेस हुआ करती थी। 
जिसमें छपी " नियामत नामा " और 'गुलज़ार-ऐ-अबरार" बेशकीमती धरोहर है।
 अफ़सोस ब्रिटिश इन धरोहरों को भी लूटकर लंदन ले गए। इसलिए भारत देश के लोग अल्लाह वलीयो की ज्यादतर मालूमात पाने से वंचित रह गए।

नालछा स्थित प्रिंटिंग प्रेस में काम आने वाला पेपर गुजरात से आता था। इसी कागज़ का व्यापार करते थे हजरत गौसी सत्तारी के वालिद हसन बिन मुसा गुजराती।

मोहम्मद गौसी बिन हसन बिन मूसा गुजराती सुम मांडवी के हालात बहुत कम मालूम है उसकी वजह ब्रिटिशों द्वारा किताबों के नुस्ख़े लूटकर लंदन ले जाना प्रमुख है।
                        गुलज़ारे अबरार
मोहम्मद गौसी शत्तारी मांडवी की पैदाइश मांडव में 11 रजब 962 हिजरी मुताबिक 1 जून 1555 शनिचर के दिन हुई। 
 हजरत कमालुद्दीन क़ुरैशी से आपने क़ुरआन शरीफ़ पढ़ा फ़िर फ़ारसी ज़ुबान की तहसील पर तवज़्ज़ो दी।
गौसी शत्तारी रह0 सिर्फ 11 बरस के थे कि आपके वालिद का साया आपके सर से उठ गया।लेकिन इन्होंने बाप की वफ़ात के बाद भी तालीम को जारी रखा। 
सिर्फ़ 17 बरस की उम्र में अजदवाजी ज़िंदगी का आगाज़ किया। इल्म नोह और इल्म अरबिया की क़िताबें हजरत शेख़ बुरहानुद्दीन कालपुरी (काल्पी) रह0 से पढ़ी।
फिर कश्फ़ , अलमनार और तलविह का दर्स हजरत सैयद शाह मोहम्मद से हासिल किया।

फिर हिजरी सन 985 में आगरा का सफ़र किया।
5 साल आगरा में रहे। हिजरी सन 990 के हिसाब से 1582 ईस्वी में ।
28 साल की उम्र में गुजरात का सफ़र किया। हजरत शेख़ वजीउद्दीन बिन नसरागा अल्वी गुजराती रह0 से अक्सर दर्सी क़िताबें पढ़ी।
बुरहानपुर में हक़ीम उस्मान बिन ईसा सिंधी से उलूमे रियाज़ी हासिल किया।
फिर हिजरी सन 994 के हिसाब से 1586 ईस्वी में वापस मांडव आ गए।
 मांडव में रहकर मांडव , धार , क़ाली बावड़ी , उज्जैन , देपालपुर , मंदसौर और मालवा के दीगर वलियों से मुलाकात करके उनकी सवाने हयात को 
गुलज़ार-ऐ-अबरार" में सिलसिलेवार पिरोया।

गुलज़ार-ऐ-अबरार" में उस वक्त के मुख़्वाजा सिलसिले के सूफिया के हालात भी दर्ज हैं।
ये बेशकीमती क़िताब हिजरी सन 998 से लेकर 1022 तक यानि 1590 ईस्वी सन से 1614 ईस्वी तक करीब 24 साल के लंबे अर्से में जब गौसी शत्तारी 60 बरस के हुए मुक़म्मल हुई।
 मुगल बादशाह अक़बर के आख़री दौर और जहाँगीर के शुरुआती शासनकाल में लिखी गई संग्रहनीय क़िताब है।

किसी जमाने में मांडव एक अजीब पुरफ़िज़ा शाही और ओलिया अल्लाह का रूहानी शहर था।
गुलज़ार-ऐ-अबरार" में हिजरी सन 700 से लेकर 1022 हिजरी तक क़रीब 422 बरसों के औलिया अल्लाह के हालात है।

हजरत गौसी सत्तारी रह0 मुस्तकीम हाल सूफ़ी थे। ओत सिलसिला सत्तारीया में शेख़ सदरुद्दीन मोहम्मद बडोदवी कुदससरा और उनके ख़लीफ़ा मेहमूद बिन जलाल गुजराती रह0 से मुसल्लिक थे। 
 गौसी सत्तारी बेमिसाल मुसन्निफ़ के साथ साथ बेहतरीन शायर भी थे।

 अहमदबाद के 'हफ्त अकलिम' में जिस मौलाना गौसी के मारूफ शख़्सियत होने और 4 अश 'आर मनकुल है।  वो यही गौसी सत्तारी रह0 है। 

संदर्भ 👇
{गुलज़ार-ऐ-अबरार" पेज नम्बर 466 ,
बुजुर्गाने दीने मालवा पेज नम्बर 102 }

Hajrat Nahar Shah Wali Dargah khajrana indore

          Hajrat Nahar Shah wali Dargah
   हजरत नाहर शाह वली की दरगाह पर मन्नत में         तोलते हुुुए

javed shah khajrana at Hajrat Nahar Shah wali Dargah khajrana
juned sultani Kawwal and javed shah khajrana 
jAved shah khajrana in Hajrat Nahar Shah wali Dargah 

सोमवार, 14 दिसंबर 2020

khajrana

✍ javed Shah khajrana
Khajrana is a town located east of the city of Indore. Khajrana, located in the middle of Ring Road and Bypass Bypass, is a historical and tourist destination. Khajrana has three famous sites of religious importance. Khajrana Ganesh Temple, Naharshah Wali's Dargah and Kalika Mata Temple. 

The Khajrana Ganga-Jamna culture associated with the religious belief of both Hindu and Muslim is the stronghold of Tehzeeb where people of all religions and caste-fraternity have been living since the Paramara rule of Raja Bhoj. Khajrane's history is older than Indore. The dargah of Hazrat Naharshah Wali is about 350 years old.

 Nagendra Azad, the author of the book Indore Darshan, writes that Malharrao Holkar, the first Maharaja of Indore, had given the tashan faqir to Khajrana. The Mughal Emperor Shah Alam, also known as Ali Gauhar Badshah, gave 50 bighas of land to the Shah family of Khajrana in 1779 AD as a reward. After the death of Sufi saint Hazrat Naharshah Wali, a dargah was erected at his tomb where the Urs is celebrated on the 13th of the month of the Rabiul topper of Islam. 

Khajrana currently falls within the municipality boundary and has 3 wards with an estimated population of about 2.5 lakhs. Khajrana is also a pioneer in politics. Apart from BJP and Congress, independents are also councilors by running the field. Has won the election of Currently, two BJP councilors and an independent councilor are representing the people here. In Khajrana there is good publicity of trade and education with a spiritual and political atmosphere. The first councilor of Khajrana, from Gulab Patel to present-day Usman Patel and Rubina Iqbal Khan, is a councilor of Khajrana. Hazrat Naharshah visits the shrine of Wali daily to offer prayers. The author of this article, Javed Shah Khajrana, is from the descendants of these Naharshah Wali.

Treasure Of brotherhood Khajrana

✍ javed Shah khajrana
Khajrana is a town located east of the city of Indore. Khajrana, located in the middle of Ring Road and Bypass Bypass, is a historical and tourist destination. Khajrana has three famous sites of religious importance. Khajrana Ganesh Temple, Naharshah Wali's Dargah and Kalika Mata Temple. 

The Khajrana Ganga-Jamna culture associated with the religious belief of both Hindu and Muslim is the stronghold of Tehzeeb where people of all religions and caste-fraternity have been living since the Paramara rule of Raja Bhoj. Khajrane's history is older than Indore. The dargah of Hazrat Naharshah Wali is about 350 years old.
 Nagendra Azad, the author of the book Indore Darshan, writes that Malharrao Holkar, the first Maharaja of Indore, had given the tashan faqir to Khajrana. The Mughal Emperor Shah Alam, also known as Ali Gauhar Badshah, gave 50 bighas of land to the Shah family of Khajrana in 1779 AD as a reward. After the death of Sufi saint Hazrat Naharshah Wali, a dargah was erected at his tomb where the Urs is celebrated on the 13th of the month of the Rabiul topper of Islam. 
Khajrana currently falls within the municipality boundary and has 3 wards with an estimated population of about 2.5 lakhs. Khajrana is also a pioneer in politics. Apart from BJP and Congress, independents are also councilors by running the field. Has won the election of Currently, two BJP councilors and an independent councilor are representing the people here. In Khajrana there is good publicity of trade and education with a spiritual and political atmosphere. The first councilor of Khajrana, from Gulab Patel to present-day Usman Patel and Rubina Iqbal Khan, is a councilor of Khajrana. Hazrat Naharshah visits the shrine of Wali daily to offer prayers. The author of this article, Javed Shah Khajrana, is from the descendants of these Naharshah Wali.

Secret Entry Gate Of Mandu


This gate stands at the south-west brink of the plateau of Mandu, facing the Tarapur village which nestles in the plains below. History, however, records that the fort wall was invaded several times from this direction. Humayun's troops are said to have scaled the walls at some point near this gateway deposit the fact that the height of the hill here is over 280 m.
 The plan of the gateway embraces an outer arch, whence broad masonry steps, defended on both sides by massive walls, lead first towards the west and then towards the north until a landing is reached, where Akbar ordered a gate to be built facing the west. 
An inscription is carved on the side wall of the gate, recording the fact that the approach to the Fort was improved by Akbar's agent Muhammed Hussain in 1014 A.H. (A.D. 1605). 

मांडव का द्वार तारापुर दरवाजा

मांडव में दाखिल होने के 12 दरवाजे है।
मांडव के सबसे आख़री हिस्से में जहाँ मांडव की वादियां खत्म होकर निमाड़ में मिलती है उसी के दक्षिण में तारापुर दरवाजा और पश्चिम में सोनगढ़ दरवाजा है।
यह द्वार मांडू के पठार के दक्षिण-पश्चिम कगार पर बना हुआ है, प
ये दरवाजा तारापुरतालाब से थोड़ी आगे गाँव के सामने है, इसके नीचे के निमाड़ के मैदान स्थित है। 
मालवा के आख़री सल्तनत कालीन सूबेदार दिलवर है इतिहास, हालांकि, रिकॉर्ड करता है कि किले की दीवार को इस दिशा से कई बार आक्रमण किया गया था।  कहा जाता है कि हुमायूँ के सैनिकों ने इस प्रवेश द्वार के पास किसी बिंदु पर दीवारों को तराशा था, इस तथ्य को जमा करता है कि यहाँ की ऊंचाई 280 मीटर है।  प्रवेश द्वार की योजना एक बाहरी मेहराब, व्यापक चौड़ी चिनाई चरणों को गले लगाती है, दोनों तरफ भारी दीवारों द्वारा बचाव किया जाता है, पहले पश्चिम की ओर जाता है और फिर उत्तर की ओर जब तक एक लैंडिंग नहीं होती है, जहां अकबर ने पश्चिम की ओर मुंह करके एक द्वार बनाने का आदेश दिया।  ।  गेट के किनारे की दीवार पर एक शिलालेख खुदा हुआ है, इस तथ्य को दर्ज करते हुए कि 1014 A.H. (A.D. 1605) में अकबर के एजेंट मुहम्मद हुसैन द्वारा किले के लिए दृष्टिकोण में सुधार किया गया था।

शनिवार, 12 दिसंबर 2020

Story Of Hajrat Nahar Shah Wali R.A.

Story Of Hajrat Sayyad  Nahar shah Vali 
 Author: -Javed Shah Khajrana (Author)
 
  The city of Indore is recognized by its religion and mutual brotherhood.  Which is full of love history inside itself.  The city of Indore is around 300 years old.
 Before Rawla Zamindars ruled here.  Even then, Hindu-Muslims lived together in Juni indore.  Kalalkui, Katkat Pura,  Alapura, Daulatganj and Ranipura locality are examples of this.
 
 There is a #dargah of Sayyad Nahar Shah vali in Khajrana situated in the east direction, away from Juni indore.  This place has been visited by the alamdar pir-fakirs of humanity, Khajrana was already inhabited by settling in Indore.

 Parmar period Khajrana has existed for 1000 years from the time of #Rajbhoj.
 In the court of Delhi's Hazrat Nizamuddin Aulia and #Ajmer's Khwaja Garib Nawaz, the commoners, the male-female, leaders and actors of all religions participate discriminately and offer their wishes.
 In the same way, the Muqaddas Dargah of the ancient Naharshah Wali of Khajrana is also the mark of worship of the eunuchs in addition to the men and women of all religions, where Zarine of all religious places has been coming for years.

 #indore referendum book states that Holkar Subedar Abdul Majeed, resident of Juna Risala, asked when freedom fighter and historian Nagendra Azad of Indore asked about Nahar shah Wali.
  Then he told that the elders of the elders used to say that "In the Khajrana area, the religion of an Allah's Wali was kept. Fakir had said that after death my body should be buried only when the prayer of 'Tehzjud' is performed  . "
 The prayer of prayer can be read by a person who has never prayed any prayer in his life.
  Because of this, for about 3 months, your body was kept in the shade of trees in Khajrana without spoiling.
 Subhan Allah .
 The area around Khajrana was a border road, where Mughals used to stay here, by coincidence, when Mughal emperor Aurangzeb came to know that the blessings of one of Allah’s Wali were kept without burial, the companions of Nahar Shah Wali called you Khajrana.
  The king said- "I will offer prayers."
 After this, your body was buried Mubarak and later the tomb was built.

 #MaharajaTukojirao used to come here occasionally with his queen and family, among those who attended the dargah of Naharshah Wali.  Because this area was surrounded by forest 60 years ago.
 One rupee was donated daily to light the Dargah on behalf of Indore Maharaj.
 Empress Pushpabala Raje of Dewas, Begum Rabia Sultana of Janjira Wals  Nawab were also included in the Zairin here that even after she died, she preferred to be buried outside the estate of Nahar Shah Wali, even today, the shrines of the Janjira family's shrine are right in the dargah.  The front is built on a green Platform.
 Shafi and Begum Naseem Bano Bakshi, nephews of Kashmir Chief Minister Ghulam Mohammad Bakshi, were also the secretaries of Khajrana Urs Committee of 1972-73.
 Film star Dilip Kumar's film Aan was shot in 1950 at #Khajrana at that time, the film's directors Mehboob Saheb and Dilip Kumar did not forget to visit the dargah.  Other actors of the same film Nimmi, Nadira and Mukari have also come to Khajrana.

 Sahabzade Khalid Rashid and Hamid, both of the famous playback singer Mohammad Rafiq, were married in 1973 to Yasmin and Fauzia, both daughters of Mirza Abdul Hameed Saheb in Indore, when the wedding was attended by Jani Walker, Salim Khan's Salid Khan, Helen, Ajit Sahab, Raza Murad  Were also involved.
 

 In 1975, while Khaqrana Khan was the receiver at the Dargah, during the Khajrana Urs, Mohammad Rafi Sahab also brought Tashred to read Naat.
  Marhoom Haider wrestler Kadabin's people are also related to Dilip Kumar.  All these have attended the court of Naharshah Wali.

  Most of the Congress and BJP leaders of Madhya Pradesh have given attendance.
 The idea of ​​Khajrana Urs was given by the famous Qawwal injured Sahib of Indore and by reading the first Kalam, he laid the foundation of Khajrana Qawwali tradition.
 Famous qawwals of the country in Khajrana Urs are Shankar Shambhu, Jani Babu, Chhota Yusuf, Azad Qawwal, Majeed Shola, Aslam Sabri, Yusuf Azad, Anjum Bano, Seema Raaz, Nikhat Naz, Kaiser Bano, Parveen Rangeili, Humsar Hayat, Anees Rais Sabri  In addition to Junaid Sultani, Azeem Naza, the local Qawwal Khalid Sabri and Aftab Qadri have also scattered.
 Now in addition to the three-day qawwali at the time of every Urs, the first 2 days are in the names of religious takir and mushaira, which people from not only Dewas, Mhow, Dhar, Ujjain, Badnagar come to see.

 The committee of Dargah and Ursa's fortunes shone through in the review of Haleem Khan, uncle of film star Salman Khan.
  When I was young, the khadim and heir of the Dargah used to take a lot of information from my maternal uncle Mukhtayar Shah ji.  At that time, around 1992, Salim Khan's uncle, Haleem Khan, used to come to the dargah to organize every jumaret.
 Haleem Saheb used to climb the stairs of the dargah with sticks and sit on the oatley near the gate.
  I would be thrilled to see them.  Mukhtayar Mamu introduced me to him.
 
 I took a lot of information from Haleem Saheb.
 He told that he used to go to Muslim film artists to collect donations for the dargah and he would give donations freely to film stars.  When I asked the names of some funners, he specifically named Waheeda Rehman, who once called Khazrana to sing Mohammad Rafiq in Urs.
 My mother tells me that Haleem Sahab had asked my grandmother to adopt my Valada.  Since my Valada was the only daughter, Nana refused.
 My grandmother was the sister-daughter of the Mujawars of the Dargah.
 She would often tell that in the old times there used to be a Nahar or Lion's camp at the Dargah of Naharshah Wali.  Naharshah Wali used to worship Allah in the midst of lions and cheetahs.  The lion i.e. Nahar cleans the place of worship of Baba with his tail so that the Wali of Allah will not have any problem with the stone.  After cleaning, Sher used to sit close to Baba.

 Kidwanti is that Hazrat Naharshah Wali loved all beings.  Apart from the fear of God, he was not afraid of anyone.  Even among the Nahars, they would remain fearless.

  Once I asked my grandmother Kubra Shah-
 How did these Vali of Allah get the name Nahar Shah?
 Giving information, he said that the farming community around the dargah in Khajrane was mostly used by the Nayata and Patidar community.
 The women of Naita Patel often took food from home for their agricultural husbands and went to the nearby fields.  While returning, there used to be an evening for the animals to cut grass.
  On the way, a lion would be seen with Baba on the way.  Seeing his life in trouble, he threw the bundle of grass and ran away.
 Go to the village and tell people that a faqir in the forest is sitting with Baba Nahar.  He did not know Baba's name.  Therefore those women called him Nahar Wala Baba.
 In this way, these Vali of Allah became Naharshah.

 Some elders say that Nahar (lion) continued to visit here until a few years ago.  As the movement progressed, this series gradually stopped.
 The people of Allah continue to make love to their loved ones.
  Some special Mujawars told me this.

 The first of the special charms of Naharshah Wali, the charisma here quickly marries the beaulads when they ask for a vow by the aulad and the virgins.  By the way, it is common for children to be weaned from fruit-ladoos when their vows are fulfilled.
 
 I saw the gathering of domesticated pigeons in the Dargah bear from the time of Mukhtayar Mamu till a few years ago.  But a few years ago, the Dargah Committee snatched the grain from those pigeons by citing dirt.  Now in the dargah, the old mosque, the old Vajukhana, the old gate, nothing can be seen.
 Everything is changed.
 If not change only then only Kahar of Naharshah Wali.
  Even today, this dargah is an example of Hindu-Muslim unity and brotherhood.
                  Author # javedshahkhajrana
                        9340949476 Mobile
 #javedShahKhajrana
 #Hajrat_Nahar_Shah_Wali_Dargah

सोमवार, 7 दिसंबर 2020

khajrana latest News 2020 in prabhat Kiran

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Story Of Hajrat Nahar Shah Wali R.A. Khajrana indore

#नाहरशाह_वली_की_कहानी 
लेखक:-जावेद शाह खजराना (लेखक)
 
 इंदौर शहर की पहचान आन-बान और शान यहां के सर्वधर्म सदभाव और आपसी भाईचारा से है। जो अपने अंदर मोहब्बत भरा इतिहास समेटे हुए है । इंदौर शहर क़रीब 300 साल पुराना है।
#होल्करस्टेट से पहले जब यहां रावला जमींदारों का राज था। तब भी हिन्दू-मुस्लिम जूनीइंदौर में साथ-साथ रहते थे। कलालकुई, कटकट पूरा, आलापुरा , दौलतगंज और रानीपुरा मोहल्ले इसके उदाहरण है।
जूनीइंदौर से दूर पूरब दिशा में स्थित खजराना में सय्यद #नाहरवली की #दरगाह है । इस स्थान पर बरसों से इंसानियत के अलमदार पीर-फकीरों का आवागमन रहा है , खजराना तो इंदौर बसने कर पहले से ही आबाद था । 
परमारकालीन खजराना #राजाभोज के समय से 1000 साल से वजूद में है।दिल्ली के हजरत निज़ामुद्दीन औलिया और #अजमेर के ख्वाज़ा गरीब नवाज के दरबार आम में देशी-विदेशी और सभी मजहब के नर-नारी , नेता- अभिनेता बिना भेदभाव से हिस्सा लेते है और अपनी मुरादों की चादर चढ़ाते हैं।
ठीक उसी प्रकार खजराना की प्राचीन नाहरशाह वली की मुकद्दस दरगाह भी सभी मजहब के मर्द-औरतों के अलावा किन्नरों की भी इबादत का मरकज है जहां बरसों से सभी महजब के जायरीन आ रहे हैं।

#इंदौर दिग्दर्शन क़िताब में लिखा है कि जूना रिसाला निवासी होल्कर सूबेदार अब्दुल मजीद से जब इंदौर के स्वतंत्रता सेनानी और इतिहासकार नगेन्द्र आज़ाद ने नाहरशाह वली के बारे में पूछा
 तब उन्होने बताया कि बुजुर्गों के बुजुर्ग बताते थे कि "खजराना इलाके में एक अल्लाह के वली की लाश पड़ी थी । फ़क़ीर ने कहा दिया था कि मौत के बाद मेरी लाश तब ही दफ़नाई जाए पहले 'तहज्जुद' की नमाज अदा हो जाए ।"
तहज्जुद की नमाज वो ही व्यक्ति पढा सकता हैं जिसने होश संभालते ही ज़िंदगी में कभी भी कोई भी नमाज क़ज़ा ना की हो।
 इस वजह से करीब 3 महीने तक आपका जिस्म मुबारक़ बिना खराब हुए खजराना में पेड़ों के साये में रखा रहा । 
सुभान अल्लाह ।
खजराना के आसपास का इलाका सरहदी रास्ता था यहां मुगलों के पड़ाव होते रहते थे इत्तिफ़ाक़ से मुगल बादशाह औरंगजेब को जब इसकी जानकारी मिली कि अल्लाह के किसी वली की लाश मुबारक़ बिना दफन के रखी है तब नाहर #शाह वली के साथियों ने आपको खजराना बुलवाया।
 बादशाह ने कहा- " मैं तहज्जुद की नमाज अदा करवाऊँगा।"
इसके बाद आपकी लाश मुबारक़ को दफनाया और बाद में मजार की तामीर हुई।
नाहरशाह वली की दरगाह पर हाजरी देने वालों में #महाराजातुकोजीराव अपनी रानी और परिवार के साथ यहां यदा-कदा आते रहते थे । क्योंकि ये इलाका आज से 60 साल पहले जंगल से घिरा था। 
इंदौर महाराज की तरफ से दरगाह पर रोशनी करने के लिए रोजाना एक रुपया दान मिलता था।
देवास की महारानी पुष्पबाला राजे , जंजीरा नवाब की बेगम राबिया सुल्ताना भी यहां की जायरीनों में इस कदर शामिल रही कि मरने के बाद भी उन्होंने नाहर शाह वली के आस्ताने के बाहर दफन होना पसंद फरमाया ,आज भी जंजीरा परिवार की ख़्वातीनों की मजारें दरगाह के ठीक सामने हरे ओटले पर बनी हुई हैं।

कश्मीर के मुख्यमंत्री गुलाम मोहम्मद बक्शी के भतीजे शफी और बेगम नसीम बानो बक्षी भी सन 1972-73 की खजराना उर्स कमेटी के सचिव रहे थे।
फ़िल्म स्टार दिलीप कुमार की फ़िल्म आन की शूटिंग 1950 में #खजराना में हुई उस समय फ़िल्म के निर्देशक मेहबूब साहब और दिलीप कुमार दरगाह पर आना नही भूले । इसी फिल्म के अन्य कलाकार निम्मी ,नादिरा और मुकरी भी खजराना आ चुके है। 
मशहूर पार्श्वगायक मोहम्मद रफ़ीक के दोनों साहबजादे खालिद राशिद और हामिद की शादी 1973 में इंदौर में मिर्जा अब्दुल हमीद साहब की दोनों बेटियों यास्मीन और फौजिया से हुई तब इस शादी में जानी वाकर ,सलमान खान के वालिद सलीम खान ,हेलन ,अजित साहब ,रज़ा मुराद भी शामिल हुए थे ।
 

1975 में खजराना उर्स के दौरान मोहम्मद रफ़ी साहब नात पढ़ने के लिए बकायदा तशरीफ़ भी लाए थे।
 मरहूम हैदर पहलवान कडाबिन वालों की रिश्तेदारी भी दिलीप कुमार से रही है। ये सब नाहरशाह वली के दरबार में हाजरी दे चुके है।

 मध्यप्रदेश के ज्यादातर कांग्रेसी और भाजपाई नेता गाहे-बगाहे हाजिरी दे चुके है। 
खजराना उर्स का आइडिया ही इंदौर के जग प्रसिद्ध क़व्वाल जख्मी साहब ने दिया और पहला कलाम पढ़कर खजराना क़व्वाली परंपरा की नींव डाली । 
खजराना उर्स में देश के मशहूर कव्वालों में शंकर शम्भू, जानी बाबू, छोटा यूसुफ ,आज़ाद क़व्वाल,मजीद शोला, असलम साबरी, यूसुफ आज़ाद, अंजुम बानो, सीमा राज़, निखत नाज ,कैसर बानो ,  परवीन रंगीली, हमसर हयात, अनीस रईस साबरी, जुनैद सुल्तानी, अज़ीम नाज़ा के अलावा स्थानीय क़व्वाल खालिद साबरी और आफताब कादरी भी अपने जलवे बिखेर चुके हैं।
अब तो हर उर्स के समय तीन दिनी क़व्वाली के अलावा शुरुआती 2 दिन मजहबी तकरीर और मुशायरे के नाम रहते है , जिसे देखने इंदौर ही नही देवास ,महू, धार, उज्जैन , बड़नगर तक से लोग आते हैं।

दरगाह की कमेटी और उर्स की किस्मत फ़िल्म स्टार सलमान खान के चाचा हलीम खान की रिसिवरी में खूब चमकी ।
 जब मैं छोटा था तब दरगाह के खादिम और वारिस मेरे मामू मुख्तयार शाह जी से बहुत सी जानकारी लेता रहता था।  उस वक्त करीब सन 1992 के आसपास सलमान खान के चाचा हलीम खान दरगाह पर हर जुमेरात को दरगाह पर ज़ियारत करने आते थे ।
हलीम साहब लाठी के सहारे दरगाह की सीढ़ियां चढ़कर  गेट के पास बने ओटले पर बैठ जाते।
 मैं उन्हें देखकर रोमांचित हो जाता । मुख्तयार मामू ने उनसे मेरा परिचय करवाया। 
 
मैने हलीम साहब से बहुत- सी जानकारियाँ ली ।
उन्होंने बताया कि दरगाह के लिए चंदा लेने वो मुस्लिम फ़िल्म कलाकरों के पास भी जाते थे और वो फ़िल्म स्टार दिल खोलकर चंदा देते । मैंने कुछ फ़नकारों के नाम पूछे तब उन्होंने वहीदा रहमान का नाम खासतौर पर लिया।उन्होंने ही एक बार उर्स में मोहम्मद रफ़ीक को गवाने के लिए खजराना बुलवा लिया था।
मेरी मम्मी बताती है कि हलीम साहब ने मेरी नानी से मेरी वालदा को गोद माँगा था। चूंकि मेरी वालदा एकमात्र बेटी थी , इसलिए नाना ने इंकार कर दिया था। 
मेरी नानी दरगाह के मुजावरों की बहन-बेटी थी । 
वो अक्सर बताया करती कि -  नाहरशाह वली की दरगाह पर पुराने जमाने में नाहर यानी शेर का डेरा रहता था। शेर-चीतों के बीच में नाहरशाह वली अल्लाह की इबादत किया करते । शेर यानी नाहर बाबा की इबादत करने की जगह को अपनी पूंछ से साफ करता ताकि अल्लाह के वली को पत्थर से कोई तकलीफ ना हो। सफाई करने के बाद शेर बाबा के करीब बैठ जाता । 
किदवंती है कि हज़रत नाहरशाह वली सभी प्राणियों से प्यार करते थे । खुदा के ख़ौफ़ के अलावा उन्हें किसी का ख़ौफ़ नही था । नाहरों के बीच भी वे बे-ख़ौफ़ रहते।

 एक बार मैंने मेरी नानी कुबरा शाह से पूछा-
अल्लाह के इन वली का नाहर शाह नाम कैसे पड़ा? 
उन्होंने जानकारी देते हुए बताया कि खजराने में दरगाह के आसपास खेतीबाड़ी ज्यादातर नायता और पाटीदार समाज के लोग ही करते थे। 
नायता पटेलों की महिलाएं अपने खेतिहर पतियों के लिए घर से खाना लेकर अक्सर पास के खेतों पर जाती। लौटते वक्त जानवरों के लिए घास काटने में शाम हो जाया करती।
 गुज़रते समय रास्ते में बाबा के साथ शेर दिख जाता। अपनी जान मुसीबत में फंसी देखकर घास का गठ्ठर फैंक कर भाग जाती ।
गांव में जाकर लोगों को बताती कि जंगल में एक फ़क़ीर बाबा नाहर के साथ बैठ्या है । बाबा का नाम तो उन्हें मालूम नही था । इसलिए वो ओरतें उन्हें नाहर वाला बाबा पुकारती।
इस तरह अल्लाह के इन वली का नाम नाहरशाह पड़ गया। 

कुछ बुजुर्ग बताते है कि कुछ सालों पहले तक यहां नाहर (शेर) का आना-जाना जारी था। चहल-पहल बढ़ने के कारण धीरे-धीरे ये सिलसिला बंद गया। 
अल्लाह के वली अपने चाहने वालों को अपनी और नाहर की ज़ियारत कराते रहते है।
 ऐसा मुझे कुछ खास मुजावरों ने बताया।

नाहरशाह वली के खास करिश्मों में सबसे पहला करिश्मा यहां बे-औलादों को औलाद और कुंवारों द्वारा मन्नत माँगने पर जल्दी शादी हो जाती है । वैसे बच्चों के पैदा होने की मन्नत पूरी होने पर उन्हें फल-लड्डुओं से तोलना आम बात है।
 
मैंने दरगाह के सहन में पालतू कबूतरों का जमावड़ा मुख्तयार मामू के जमाने से लेकर कुछ साल पहले तक देखा । लेकिन कुछ बरसों पहले दरगाह कमेटी ने गंदगी का हवाला देकर उन कबूतरों के मुंह से भी दाना छीन लिया। अब दरगाह में पुरानी मस्जिद , पुराना वजूखाना , पुराना गेट कुछ भी नजर नही आता ।
सब कुछ बदल गया है।
नही बदला तो सिर्फ और सिर्फ़ नाहरशाह वली का करम।
 आज भी ये दरगाह हिन्दू-मुस्लिम एकता और भाईचारे की मिसाल  है।
                       9340949476 मोबाईल

शनिवार, 5 दिसंबर 2020

नाहर शाह वली सरकार खजराना इंदौर

#नाहरशाह_वली_की_कहानी 
लेखक:-जावेद शाह खजराना
       Hajrat Nahar Shah wali Gumbad

इंदौर शहर की पहचान आन-बान और शान यहां के सर्वधर्म सदभाव और आपसी भाईचारा से है। जो अपने अंदर मोहब्बत भरा इतिहास समेटे हुए है । इंदौर शहर क़रीब 300 साल पुराना है।
होल्कर स्टेट से पहले जब यहां रावला जमींदारों का राज था। तब भी हिन्दू-मुस्लिम जूनीइंदौर में साथ-साथ रहते थे। कलालकुई, कटकट पूरा, आलापुरा , दौलतगंज और रानीपुरा इसके उदाहरण है।
जूनीइंदौर से दूर पूरब दिशा में स्थित खजराना में सय्यद नाहरशाह वली की दरगाह जहां बरसों से इंसानियत के अलमदार पीर-फकीरों का आवागमन रहा है इंदौर से पहले से आबाद थी । 
परमारकालीन खजराना राजा भोज के समय से 1000 साल से वजूद में है।
दिल्ली के हजरत निज़ामुद्दीन औलिया और अजमेर के ख्वाज़ा गरीब नवाज के दरबार आम में देशी-विदेशी और सभी मजहब के नर-नारी , नेता- अभिनेता बिना भेदभाव से हिस्सा लेते है और अपनी मुरादों की चादर चढ़ाते हैं।
ठीक उसी प्रकार खजराना की प्राचीन नाहरशाह वली की मुकद्दस दरगाह भी सभी मजहब के मर्द-औरतों के अलावा किन्नरों की भी इबादत का मरकज है जहां बरसों से जायरीन आ रहे हैं।
          Hajrat Nahar Shah Wali Dargah

इंदौर दिग्दर्शन क़िताब में लिखा है कि जूना रिसाला निवासी होल्कर सूबेदार अब्दुल मजीद से जब इंदौर के स्वतंत्रता सेनानी और इतिहासकार नगेन्द्र आज़ाद ने नाहरशाह वली के बारे में पूछा
 तब उन्होने बताया कि बुजुर्गों के बुजुर्ग बताते थे कि "खजराना इलाके में एक अल्लाह के वली की लाश पड़ी थी । फ़क़ीर ने कहा दिया था कि मौत के बाद मेरी लाश तब ही दफ़नाई जाए पहले 'तहज्जुद' की नमाज अदा हो जाए ।"
तहज्जुद की नमाज वो ही व्यक्ति पढा सकता हैं जिसने होश संभालते ही ज़िंदगी में कभी भी कोई भी नमाज क़ज़ा ना की हो।
 इस वजह से करीब 3 महीने तक आपका जिस्म मुबारक़ बिना खराब हुए खजराना में पेड़ों के साये में रखा रहा । 
सुभान अल्लाह ।
खजराना के आसपास का इलाका सरहदी रास्ता था यहां मुगलों के पड़ाव होते रहते थे इत्तिफ़ाक़ से मुगल बादशाह औरंगजेब को जब इसकी जानकारी मिली कि अल्लाह के किसी वली की लाश मुबारक़ बिना दफन के रखी है तब नाहरशाह वली के साथियों ने आपको खजराना बुलवाया।
 बादशाह ने कहा- " मैं तहज्जुद की नमाज अदा करवाऊँगा।"
इसके बाद आपकी लाश मुबारक़ को दफनाया और बाद में मजार की तामीर हुई।

नाहरशाह वली की दरगाह पर हाजरी देने वालों में महाराजा तुकाजीराव अपनी रानी और परिवार के साथ यहां यदा-कदा आते रहते थे । क्योंकि ये इलाका आज से 60 साल पहले जंगल से घिरा था। 
देवास की महारानी पुष्पबाला राजे , जंजीरा नवाब की बेगम राबिया सुल्ताना भी यहां की जायरीनों में इस कदर शामिल रही कि मरने के बाद भी आपके आस्ताने के बाहर दफन होना पसंद फरमाया,आज भी जंजीरा परिवार की ख़्वातीनों की मजारें दरगाह के सामने ओटले पर बनी हुई हैं।

कश्मीर के मुख्यमंत्री गुलाम मोहम्मद बक्शी के भतीजे शफी और बेगम नसीम बानो बक्षी भी सन 1972-73 की खजराना उर्स कमेटी के सचिव रहे थे।
फ़िल्म स्टार दिलीप कुमार की फ़िल्म आन की शूटिंग 1950 में खजराना में हुई उस समय फ़िल्म के निर्देशक मेहबूब साहब और दिलीप कुमार दरगाह पर आना नही भूले । इसी फिल्म के अन्य कलाकार निम्मी ,नादिरा और मुकरी भी खजराना आ चुके है। मशहूर पार्श्वगायक मोहम्मद रफ़ीक के दोनों साहबजादे खालिद राशिद और हामिद की शादी 1973 में इंदौर में मिर्जा अब्दुल हमीद साहब की दोनों बेटियों यास्मीन और फौजिया से हुई तब इस शादी में जानी वाकर ,सलमान खान के वालिद सलीम खान ,हेलन ,अजित साहब ,रज़ा मुराद भी शामिल हुए थे ।

1975 में खजराना उर्स के दौरान मोहम्मद रफ़ी साहब नात पढ़ने के लिए बकायदा तशरीफ़ भी लाए थे।
 मरहूम हैदर पहलवान कडाबिन वालों की रिश्तेदारी भी दिलीप कुमार से रही है। ये सब नाहरशाह वली के दरबार में हाजरी दे चुके है।

 मध्यप्रदेश के ज्यादातर कांग्रेसी और भाजपाई नेता गाहे-बगाहे हाजिरी दे चुके है। 
खजराना उर्स का आइडिया ही इंदौर के जग प्रसिद्ध क़व्वाल जख्मी साहब ने दिया और पहला कलाम पढ़कर खजराना क़व्वाली परंपरा की नींव डाली । 
खजराना उर्स में देश के मशहूर कव्वालों में शंकर शम्भू, जानी बाबू, छोटा यूसुफ ,आज़ाद क़व्वाल,मजीद शोला, असलम साबरी, यूसुफ आज़ाद, अंजुम बानो, सीमा राज़, निखत नाज ,कैसर बानो ,  परवीन रंगीली, हमसर हयात, अनीस रईस साबरी, जुनैद सुल्तानी, अज़ीम नाज़ा के अलावा स्थानीय क़व्वाल खालिद साबरी और आफताब कादरी भी अपने जलवे बिखेर चुके हैं।
अब तो हर उर्स के समय तीन दिनी क़व्वाली के अलावा शुरुआती 2 दिन मजहबी तकरीर और मुशायरे के नाम रहते है , जिसे देखने इंदौर ही नही देवास ,महू, धार, उज्जैन , बड़नगर तक से लोग आते हैं।

दरगाह की कमेटी और उर्स की किस्मत फ़िल्म स्टार सलमान खान के चाचा हलीम खान की रिसिवरी में खूब चमकी ।
 जब मैं छोटा था तब दरगाह के खादिम और वारिस मेरे मामू मुख्तयार शाह जी से बहुत सी जानकारी लेता रहता था।  उस वक्त करीब सन 1992 के आसपास सलमान खान के चाचा हलीम खान दरगाह पर हर जुमेरात को दरगाह पर ज़ियारत करने आते थे ।
हलीम साहब लाठी के सहारे दरगाह की सीढ़ियां चढ़कर  गेट के पास बने ओटले पर बैठ जाते।
 मैं उन्हें देखकर रोमांचित हो जाता । मुख्तयार मामू ने उनसे मेरा परिचय करवाया। 
                 Muzawar'S Mazar
मैने हलीम साहब से बहुत- सी जानकारियाँ ली ।
उन्होंने बताया कि दरगाह के लिए चंदा लेने वो मुस्लिम फ़िल्म कलाकरों के पास भी जाते थे और वो फ़िल्म स्टार दिल खोलकर चंदा देते । मैंने कुछ फ़नकारों के नाम पूछे तब उन्होंने वहीदा रहमान का नाम खासतौर पर लिया।उन्होंने ही एक बार उर्स में मोहम्मद रफ़ीक को गवाने के लिए खजराना बुलवा लिया था।
मेरी मम्मी बताती है कि हलीम साहब ने मेरी नानी से मेरी वालदा को गोद माँगा था। चूंकि मेरी वालदा एकमात्र बेटी थी , इसलिए नाना ने इंकार कर दिया था। 
मेरी नानी दरगाह के मुजावरों की बहन-बेटी थी । 
वो अक्सर बताया करती कि -  नाहरशाह वली की दरगाह पर पुराने जमाने में नाहर यानी शेर का डेरा रहता था। शेर-चीतों के बीच में नाहरशाह वली अल्लाह की इबादत किया करते । शेर यानी नाहर बाबा की इबादत करने की जगह को अपनी पूंछ से साफ करता ताकि अल्लाह के वली को पत्थर से कोई तकलीफ ना हो। सफाई करने के बाद शेर बाबा के करीब बैठ जाता । 

किदवंती है कि हज़रत नाहरशाह वली सभी प्राणियों से प्यार करते थे । खुदा के ख़ौफ़ के अलावा उन्हें किसी का ख़ौफ़ नही था । नाहरों के बीच भी वे बे-ख़ौफ़ रहते।


 एक बार मैंने मेरी नानी कुबरा शाह से पूछा-
अल्लाह के इन वली का नाहर शाह नाम कैसे पड़ा? 
उन्होंने जानकारी देते हुए बताया कि खजराने में दरगाह के आसपास खेतीबाड़ी ज्यादातर नायता और पाटीदार समाज के लोग ही करते थे। 
नायता पटेलों की महिलाएं अपने खेतिहर पतियों के लिए घर से खाना लेकर अक्सर पास के खेतों पर जाती। लौटते वक्त जानवरों के लिए घास काटने में शाम हो जाया करती।
 गुज़रते समय रास्ते में बाबा के साथ शेर दिख जाता। अपनी जान मुसीबत में फंसी देखकर घास का गठ्ठर फैंक कर भाग जाती ।
गांव में जाकर लोगों को बताती कि जंगल में एक फ़क़ीर बाबा नाहर के साथ बैठ्या है । बाबा का नाम तो उन्हें मालूम नही था । इसलिए वो ओरतें उन्हें नाहर वाला बाबा पुकारती।
इस तरह अल्लाह के इन वली का नाम नाहरशाह पड़ गया। 

कुछ बुजुर्ग बताते है कि कुछ सालों पहले तक यहां नाहर (शेर) का आना-जाना जारी था। चहल-पहल बढ़ने के कारण धीरे-धीरे ये सिलसिला बंद गया। 
अल्लाह के वली अपने चाहने वालों को अपनी और नाहर की ज़ियारत कराते रहते है।
 ऐसा मुझे कुछ खास मुजावरों ने बताया।
   Main Gate Of Nahar Shah Wali Dargah
नाहरशाह वली के खास करिश्मों में सबसे पहला करिश्मा यहां बे-औलादों को औलाद और कुंवारों द्वारा मन्नत माँगने पर जल्दी शादी हो जाती है । वैसे बच्चों के पैदा होने की मन्नत पूरी होने पर उन्हें फल-लड्डुओं से तोलना आम बात है।
 
मैंने दरगाह के सहन में पालतू कबूतरों का जमावड़ा मुख्तयार मामू के जमाने से लेकर कुछ साल पहले तक देखा । लेकिन कुछ बरसों पहले दरगाह कमेटी ने गंदगी का हवाला देकर उन कबूतरों के मुंह से भी दाना छीन लिया। अब दरगाह में पुरानी मस्जिद , पुराना वजूखाना , पुराना गेट कुछ भी नजर नही आता ।
सब कुछ बदल गया है।
नही बदला तो सिर्फ और सिर्फ़ नाहरशाह वली का करम।

                 लेखक:- जावेद शाह खजराना
                   9340949476 मोबाईल

हजरत नाहर शाह वली की कहानी , जावेद शाह की जुबानी

#नाहरशाह_वली_की_कहानी 
लेखक:-जावेद शाह खजराना
       Hajrat Nahar Shah wali Gumbad

इंदौर शहर की पहचान आन-बान और शान यहां के सर्वधर्म सदभाव और आपसी भाईचारा से है। जो अपने अंदर मोहब्बत भरा इतिहास समेटे हुए है । इंदौर शहर क़रीब 300 साल पुराना है।
होल्कर स्टेट से पहले जब यहां रावला जमींदारों का राज था। तब भी हिन्दू-मुस्लिम जूनीइंदौर में साथ-साथ रहते थे। कलालकुई, कटकट पूरा, आलापुरा , दौलतगंज और रानीपुरा इसके उदाहरण है।
जूनीइंदौर से दूर पूरब दिशा में स्थित खजराना में सय्यद नाहरशाह वली की दरगाह जहां बरसों से इंसानियत के अलमदार पीर-फकीरों का आवागमन रहा है इंदौर से पहले से आबाद थी । 
परमारकालीन खजराना राजा भोज के समय से 1000 साल से वजूद में है।
दिल्ली के हजरत निज़ामुद्दीन औलिया और अजमेर के ख्वाज़ा गरीब नवाज के दरबार आम में देशी-विदेशी और सभी मजहब के नर-नारी , नेता- अभिनेता बिना भेदभाव से हिस्सा लेते है और अपनी मुरादों की चादर चढ़ाते हैं।
ठीक उसी प्रकार खजराना की प्राचीन नाहरशाह वली की मुकद्दस दरगाह भी सभी मजहब के मर्द-औरतों के अलावा किन्नरों की भी इबादत का मरकज है जहां बरसों से जायरीन आ रहे हैं।
          Hajrat Nahar Shah Wali Dargah

इंदौर दिग्दर्शन क़िताब में लिखा है कि जूना रिसाला निवासी होल्कर सूबेदार अब्दुल मजीद से जब इंदौर के स्वतंत्रता सेनानी और इतिहासकार नगेन्द्र आज़ाद ने नाहरशाह वली के बारे में पूछा
 तब उन्होने बताया कि बुजुर्गों के बुजुर्ग बताते थे कि "खजराना इलाके में एक अल्लाह के वली की लाश पड़ी थी । फ़क़ीर ने कहा दिया था कि मौत के बाद मेरी लाश तब ही दफ़नाई जाए पहले 'तहज्जुद' की नमाज अदा हो जाए ।"
तहज्जुद की नमाज वो ही व्यक्ति पढा सकता हैं जिसने होश संभालते ही ज़िंदगी में कभी भी कोई भी नमाज क़ज़ा ना की हो।
 इस वजह से करीब 3 महीने तक आपका जिस्म मुबारक़ बिना खराब हुए खजराना में पेड़ों के साये में रखा रहा । 
सुभान अल्लाह ।
खजराना के आसपास का इलाका सरहदी रास्ता था यहां मुगलों के पड़ाव होते रहते थे इत्तिफ़ाक़ से मुगल बादशाह औरंगजेब को जब इसकी जानकारी मिली कि अल्लाह के किसी वली की लाश मुबारक़ बिना दफन के रखी है तब नाहरशाह वली के साथियों ने आपको खजराना बुलवाया।
 बादशाह ने कहा- " मैं तहज्जुद की नमाज अदा करवाऊँगा।"
इसके बाद आपकी लाश मुबारक़ को दफनाया और बाद में मजार की तामीर हुई।

नाहरशाह वली की दरगाह पर हाजरी देने वालों में महाराजा तुकाजीराव अपनी रानी और परिवार के साथ यहां यदा-कदा आते रहते थे । क्योंकि ये इलाका आज से 60 साल पहले जंगल से घिरा था। 
देवास की महारानी पुष्पबाला राजे , जंजीरा नवाब की बेगम राबिया सुल्ताना भी यहां की जायरीनों में इस कदर शामिल रही कि मरने के बाद भी आपके आस्ताने के बाहर दफन होना पसंद फरमाया,आज भी जंजीरा परिवार की ख़्वातीनों की मजारें दरगाह के सामने ओटले पर बनी हुई हैं।

कश्मीर के मुख्यमंत्री गुलाम मोहम्मद बक्शी के भतीजे शफी और बेगम नसीम बानो बक्षी भी सन 1972-73 की खजराना उर्स कमेटी के सचिव रहे थे।
फ़िल्म स्टार दिलीप कुमार की फ़िल्म आन की शूटिंग 1950 में खजराना में हुई उस समय फ़िल्म के निर्देशक मेहबूब साहब और दिलीप कुमार दरगाह पर आना नही भूले । इसी फिल्म के अन्य कलाकार निम्मी ,नादिरा और मुकरी भी खजराना आ चुके है। मशहूर पार्श्वगायक मोहम्मद रफ़ीक के दोनों साहबजादे खालिद राशिद और हामिद की शादी 1973 में इंदौर में मिर्जा अब्दुल हमीद साहब की दोनों बेटियों यास्मीन और फौजिया से हुई तब इस शादी में जानी वाकर ,सलमान खान के वालिद सलीम खान ,हेलन ,अजित साहब ,रज़ा मुराद भी शामिल हुए थे ।

1975 में खजराना उर्स के दौरान मोहम्मद रफ़ी साहब नात पढ़ने के लिए बकायदा तशरीफ़ भी लाए थे।
 मरहूम हैदर पहलवान कडाबिन वालों की रिश्तेदारी भी दिलीप कुमार से रही है। ये सब नाहरशाह वली के दरबार में हाजरी दे चुके है।

 मध्यप्रदेश के ज्यादातर कांग्रेसी और भाजपाई नेता गाहे-बगाहे हाजिरी दे चुके है। 
खजराना उर्स का आइडिया ही इंदौर के जग प्रसिद्ध क़व्वाल जख्मी साहब ने दिया और पहला कलाम पढ़कर खजराना क़व्वाली परंपरा की नींव डाली । 
खजराना उर्स में देश के मशहूर कव्वालों में शंकर शम्भू, जानी बाबू, छोटा यूसुफ ,आज़ाद क़व्वाल,मजीद शोला, असलम साबरी, यूसुफ आज़ाद, अंजुम बानो, सीमा राज़, निखत नाज ,कैसर बानो ,  परवीन रंगीली, हमसर हयात, अनीस रईस साबरी, जुनैद सुल्तानी, अज़ीम नाज़ा के अलावा स्थानीय क़व्वाल खालिद साबरी और आफताब कादरी भी अपने जलवे बिखेर चुके हैं।
अब तो हर उर्स के समय तीन दिनी क़व्वाली के अलावा शुरुआती 2 दिन मजहबी तकरीर और मुशायरे के नाम रहते है , जिसे देखने इंदौर ही नही देवास ,महू, धार, उज्जैन , बड़नगर तक से लोग आते हैं।

दरगाह की कमेटी और उर्स की किस्मत फ़िल्म स्टार सलमान खान के चाचा हलीम खान की रिसिवरी में खूब चमकी ।
 जब मैं छोटा था तब दरगाह के खादिम और वारिस मेरे मामू मुख्तयार शाह जी से बहुत सी जानकारी लेता रहता था।  उस वक्त करीब सन 1992 के आसपास सलमान खान के चाचा हलीम खान दरगाह पर हर जुमेरात को दरगाह पर ज़ियारत करने आते थे ।
हलीम साहब लाठी के सहारे दरगाह की सीढ़ियां चढ़कर  गेट के पास बने ओटले पर बैठ जाते।
 मैं उन्हें देखकर रोमांचित हो जाता । मुख्तयार मामू ने उनसे मेरा परिचय करवाया। 
                 Muzawar'S Mazar
मैने हलीम साहब से बहुत- सी जानकारियाँ ली ।
उन्होंने बताया कि दरगाह के लिए चंदा लेने वो मुस्लिम फ़िल्म कलाकरों के पास भी जाते थे और वो फ़िल्म स्टार दिल खोलकर चंदा देते । मैंने कुछ फ़नकारों के नाम पूछे तब उन्होंने वहीदा रहमान का नाम खासतौर पर लिया।उन्होंने ही एक बार उर्स में मोहम्मद रफ़ीक को गवाने के लिए खजराना बुलवा लिया था।
मेरी मम्मी बताती है कि हलीम साहब ने मेरी नानी से मेरी वालदा को गोद माँगा था। चूंकि मेरी वालदा एकमात्र बेटी थी , इसलिए नाना ने इंकार कर दिया था। 
मेरी नानी दरगाह के मुजावरों की बहन-बेटी थी । 
वो अक्सर बताया करती कि -  नाहरशाह वली की दरगाह पर पुराने जमाने में नाहर यानी शेर का डेरा रहता था। शेर-चीतों के बीच में नाहरशाह वली अल्लाह की इबादत किया करते । शेर यानी नाहर बाबा की इबादत करने की जगह को अपनी पूंछ से साफ करता ताकि अल्लाह के वली को पत्थर से कोई तकलीफ ना हो। सफाई करने के बाद शेर बाबा के करीब बैठ जाता । 

किदवंती है कि हज़रत नाहरशाह वली सभी प्राणियों से प्यार करते थे । खुदा के ख़ौफ़ के अलावा उन्हें किसी का ख़ौफ़ नही था । नाहरों के बीच भी वे बे-ख़ौफ़ रहते।


 एक बार मैंने मेरी नानी कुबरा शाह से पूछा-
अल्लाह के इन वली का नाहर शाह नाम कैसे पड़ा? 
उन्होंने जानकारी देते हुए बताया कि खजराने में दरगाह के आसपास खेतीबाड़ी ज्यादातर नायता और पाटीदार समाज के लोग ही करते थे। 
नायता पटेलों की महिलाएं अपने खेतिहर पतियों के लिए घर से खाना लेकर अक्सर पास के खेतों पर जाती। लौटते वक्त जानवरों के लिए घास काटने में शाम हो जाया करती।
 गुज़रते समय रास्ते में बाबा के साथ शेर दिख जाता। अपनी जान मुसीबत में फंसी देखकर घास का गठ्ठर फैंक कर भाग जाती ।
गांव में जाकर लोगों को बताती कि जंगल में एक फ़क़ीर बाबा नाहर के साथ बैठ्या है । बाबा का नाम तो उन्हें मालूम नही था । इसलिए वो ओरतें उन्हें नाहर वाला बाबा पुकारती।
इस तरह अल्लाह के इन वली का नाम नाहरशाह पड़ गया। 

कुछ बुजुर्ग बताते है कि कुछ सालों पहले तक यहां नाहर (शेर) का आना-जाना जारी था। चहल-पहल बढ़ने के कारण धीरे-धीरे ये सिलसिला बंद गया। 
अल्लाह के वली अपने चाहने वालों को अपनी और नाहर की ज़ियारत कराते रहते है।
 ऐसा मुझे कुछ खास मुजावरों ने बताया।
   Main Gate Of Nahar Shah Wali Dargah
नाहरशाह वली के खास करिश्मों में सबसे पहला करिश्मा यहां बे-औलादों को औलाद और कुंवारों द्वारा मन्नत माँगने पर जल्दी शादी हो जाती है । वैसे बच्चों के पैदा होने की मन्नत पूरी होने पर उन्हें फल-लड्डुओं से तोलना आम बात है।
 
मैंने दरगाह के सहन में पालतू कबूतरों का जमावड़ा मुख्तयार मामू के जमाने से लेकर कुछ साल पहले तक देखा । लेकिन कुछ बरसों पहले दरगाह कमेटी ने गंदगी का हवाला देकर उन कबूतरों के मुंह से भी दाना छीन लिया। अब दरगाह में पुरानी मस्जिद , पुराना वजूखाना , पुराना गेट कुछ भी नजर नही आता ।
सब कुछ बदल गया है।
नही बदला तो सिर्फ और सिर्फ़ नाहरशाह वली का करम।

                 लेखक:- जावेद शाह खजराना
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