मंगलवार, 15 दिसंबर 2020

'गुलज़ारे अबरार' के लेखक मोहम्मद गौसी शत्तारी मांडवी

'गुलज़ारे अबरार' के लेखक मोहम्मद गौसी शत्तारी मांडववाले
✍ जावेद शाह खजराना

दोस्तों आपने
 अमीर खुसरो , फरिश्ता और अबुल फ़ज़ल जैसे दरबारी लेखकों के बारे मेें जरूर पढ़ा होगा। इन्हीं महान लेखकों फरिश्ता और अबुल फजल के दौर में ऐसी भी हस्ती गुजरी है जिन्हें बहुत कम लोग जानते हैं। ऐसे ही एक गुमनाम लेकिन अपने वक़्त के मशहूर मुसन्निफ़ (लेखक) का नाम है  हजरत मोहम्मद गौसी शत्तारी मांडवी रह0    ।
मोहम्मद गौसी शत्तारी मांडवी रह0 ने अपनी सारी जिंदगी अल्लाह के वलीयो की सोहबत में रहकर और उनके बारे में लिखते हुए गुजार दी।

 हिंदुस्तान / पाकिस्तान के करीब 612 वलियों की बेशकीमती मालूमात हमें मोहम्मद गौसी शत्तारी मांडवी रह0 द्वारा लिखे गए "गुलज़ार-ऐ-अबरार" ग्रँथ द्वारा ही मिलती है।
सल्तनत दौर में मांडव के पास नालछा गाँव में रंग-बिरंगी छपाई की प्रिंटिंग प्रेस हुआ करती थी। 
जिसमें छपी " नियामत नामा " और 'गुलज़ार-ऐ-अबरार" बेशकीमती धरोहर है।
 अफ़सोस ब्रिटिश इन धरोहरों को भी लूटकर लंदन ले गए। इसलिए भारत देश के लोग अल्लाह वलीयो की ज्यादतर मालूमात पाने से वंचित रह गए।

नालछा स्थित प्रिंटिंग प्रेस में काम आने वाला पेपर गुजरात से आता था। इसी कागज़ का व्यापार करते थे हजरत गौसी सत्तारी के वालिद हसन बिन मुसा गुजराती।

मोहम्मद गौसी बिन हसन बिन मूसा गुजराती सुम मांडवी के हालात बहुत कम मालूम है उसकी वजह ब्रिटिशों द्वारा किताबों के नुस्ख़े लूटकर लंदन ले जाना प्रमुख है।
                        गुलज़ारे अबरार
मोहम्मद गौसी शत्तारी मांडवी की पैदाइश मांडव में 11 रजब 962 हिजरी मुताबिक 1 जून 1555 शनिचर के दिन हुई। 
 हजरत कमालुद्दीन क़ुरैशी से आपने क़ुरआन शरीफ़ पढ़ा फ़िर फ़ारसी ज़ुबान की तहसील पर तवज़्ज़ो दी।
गौसी शत्तारी रह0 सिर्फ 11 बरस के थे कि आपके वालिद का साया आपके सर से उठ गया।लेकिन इन्होंने बाप की वफ़ात के बाद भी तालीम को जारी रखा। 
सिर्फ़ 17 बरस की उम्र में अजदवाजी ज़िंदगी का आगाज़ किया। इल्म नोह और इल्म अरबिया की क़िताबें हजरत शेख़ बुरहानुद्दीन कालपुरी (काल्पी) रह0 से पढ़ी।
फिर कश्फ़ , अलमनार और तलविह का दर्स हजरत सैयद शाह मोहम्मद से हासिल किया।

फिर हिजरी सन 985 में आगरा का सफ़र किया।
5 साल आगरा में रहे। हिजरी सन 990 के हिसाब से 1582 ईस्वी में ।
28 साल की उम्र में गुजरात का सफ़र किया। हजरत शेख़ वजीउद्दीन बिन नसरागा अल्वी गुजराती रह0 से अक्सर दर्सी क़िताबें पढ़ी।
बुरहानपुर में हक़ीम उस्मान बिन ईसा सिंधी से उलूमे रियाज़ी हासिल किया।
फिर हिजरी सन 994 के हिसाब से 1586 ईस्वी में वापस मांडव आ गए।
 मांडव में रहकर मांडव , धार , क़ाली बावड़ी , उज्जैन , देपालपुर , मंदसौर और मालवा के दीगर वलियों से मुलाकात करके उनकी सवाने हयात को 
गुलज़ार-ऐ-अबरार" में सिलसिलेवार पिरोया।

गुलज़ार-ऐ-अबरार" में उस वक्त के मुख़्वाजा सिलसिले के सूफिया के हालात भी दर्ज हैं।
ये बेशकीमती क़िताब हिजरी सन 998 से लेकर 1022 तक यानि 1590 ईस्वी सन से 1614 ईस्वी तक करीब 24 साल के लंबे अर्से में जब गौसी शत्तारी 60 बरस के हुए मुक़म्मल हुई।
 मुगल बादशाह अक़बर के आख़री दौर और जहाँगीर के शुरुआती शासनकाल में लिखी गई संग्रहनीय क़िताब है।

किसी जमाने में मांडव एक अजीब पुरफ़िज़ा शाही और ओलिया अल्लाह का रूहानी शहर था।
गुलज़ार-ऐ-अबरार" में हिजरी सन 700 से लेकर 1022 हिजरी तक क़रीब 422 बरसों के औलिया अल्लाह के हालात है।

हजरत गौसी सत्तारी रह0 मुस्तकीम हाल सूफ़ी थे। ओत सिलसिला सत्तारीया में शेख़ सदरुद्दीन मोहम्मद बडोदवी कुदससरा और उनके ख़लीफ़ा मेहमूद बिन जलाल गुजराती रह0 से मुसल्लिक थे। 
 गौसी सत्तारी बेमिसाल मुसन्निफ़ के साथ साथ बेहतरीन शायर भी थे।

 अहमदबाद के 'हफ्त अकलिम' में जिस मौलाना गौसी के मारूफ शख़्सियत होने और 4 अश 'आर मनकुल है।  वो यही गौसी सत्तारी रह0 है। 

संदर्भ 👇
{गुलज़ार-ऐ-अबरार" पेज नम्बर 466 ,
बुजुर्गाने दीने मालवा पेज नम्बर 102 }

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